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रजत जयंती केवल उत्सव नहीं, यह झारखंड की आत्मा को बचाने का आह्वान है

“संघर्ष से सृजन तक : झारखण्ड के 25 वर्ष एक अधूरी”

रांची : झारखंड, वह धरती जिसने बिरसा मुंडा की जंग से अपनी पहचान पाई, आज अपनी रजत जयंती मना रहा है।बिहार से अलग होकर बने इस राज्य ने 25 वर्षों में खनिजों की खानें, उद्योगों के सपने और राजनीतिक प्रयोग देखे, लेकिन आदिवासी मूलवासी जनता के चेहरों पर मुस्कान अब भी अधूरी है। झारखंड आंदोलन की नींव थी — “जल, जंगल, जमीन”।आदिवासी-मूलवासी समाज ने दशकों तक संघर्ष किया, ताकि उनकी भूमि, संस्कृति और पहचान सुरक्षित रहे। पर राज्य बनने के 25 वर्ष बाद, वही समाज आज पलायन, विस्थापन और बेरोजगारी के बोझ तले दबा है झारखंड रजत जयंती : समृद्धि की खान पर गरीबी का अभिशाप – एक दर्दनाक समीक्षा 15 नवंबर 2000 – वह दिन जब बिहार की गोद से अलग होकर झारखंड ने अपनी अलग पहचान को साकार किया था । बिरसा मुंडा की जन्मभूमि पर एक नया सूर्योदय हुआ, जो ‘जल, जंगल, जमीन’ के अधिकारों की पुकार पर टिका था । 25 वर्षों बाद, आज रजत जयंती के अवसर पर जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो एक कड़वी सच्चाई सामने आती है | यह राज्य खनिजों की खान तो बन गया, लेकिन अपनी जनता की पीड़ा के सागर को नही मिटा सका। विकास की चकाचौंध में छिपी है एक लंबी कतार – विस्थापित दलित, आदिवासी, बेरोजगार युवा, पलायन की मार झेलती महिलाएं , भ्रष्टाचार की भेंट चढ़े दलित-आदिवासी मूलवासी , माइनॉरिटी समुदाय। यह लेख न केवल 25 वर्षों के विकास का लेखा-जोखा प्रस्तुत करता है, बल्कि उन अनछुए पहलुओं को भी उजागर करता है जो राज्य को एक समावेशी भविष्य की ओर ले जा सकते हैं। यह एक आह्वान है – झारखंड की आत्मा को बचाने का।राज्य निर्माण की आकांक्षा: स्वप्न जो अधूरे रह गए झारखंड का जन्म आंदोलन की गोद में हुआ था। शिबू सोरेन, बिनोद बिहारी महतो जैसे नायकों एवं अन्य असंख्य गुमनाम शहीदों ने ‘झारखंडी’ पहचान को ललकारा, जब बिहार सरकार की उपेक्षा ने आदिवासियों मूलवासियों को हाशिए पर धकेल दिया। 2000 में राज्य बनने पर अपेक्षाएं आसमान छू रही थीं : खनिज संपदा (भारत के 40% खनिज यहां) से समृद्धि, स्थानीय नीतियां जो आदिवासी-दलित -मूलवासियों हितों की रक्षा करें, और एक ऐसा नियोजन जो पलायन रोककर रोजगार पैदा करे। लेकिन 25 वर्षों में क्या हुआ ? आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार, राज्य की जीएसडीपी 7.7% बढ़ने का अनुमान है, लेकिन बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) में 46.16% आबादी गरीबी रेखा से नीचे है – राष्ट्रीय औसत से दोगुना। विकास हुआ, लेकिन असमान। अपेक्षा थी कि राज्य में प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत को पार कर जाएगा , लेकिन आज भी यह पिछड़ा है। अपेक्षा थी कि खनन से राजस्व स्थानीय कल्याण में लगे, लेकिन लूट का सिलसिला जारी रहा है। झारखंडी जनता की पीड़ा : विस्थापन, पलायन और संसाधनों की लूट झारखंड की मिट्टी में कोयला, बॉक्साइट, लोहा छिपा है, लेकिन इसकी कीमत झारखंडी जनता ने व्यापक रूप चुकाई है जिसकी क्षतिपूर्ती असंभव है । खनन परियोजनाओं से 65 लाख आदिवासी विस्थापित हुए, बिना पर्याप्त पुनर्वास के जो आदिवासी समाज के नरसंहार जैसा है । जल, जंगल, जमीन की लूट ने आदिवासियों मूलवासियों को बेघर कर हाशिये में डाल दिया। पाथरगढ़िया आंदोलन हो या नियामगिरि की लड़ाई, हर बार स्थानीय नीतियां बाहरी पूंजी के आगे झुक गईं। भाषा और संस्कृति की रक्षा का वादा हुआ, लेकिन नागपुरी, संथाली जैसी बोलियां शिक्षा-प्रशासन से गायब। स्थानीय नीति का उल्लंघन: CNT/SPT एक्ट (छोटानागपुर और संथाल परगना टेनेंसी एक्ट) का दुरुपयोग हो रहा, जहां ‘दिकू’ (बाहरी) व्यापारी-राजनेता जमीन हड़प रहे हैं। पेसाकानून 25 वर्षो में भी लागु नही हो सका जो की आदिवासी मूलवासी समाज की आत्मा थी |पलायन राज्य का सबसे बड़ा घाव रहा जो आज कैंसर बन चूका है । 25 वर्षों में लाखों युवा ,युवतियाँ दिल्ली, मुंबई की चमचमाती सड़कों पर मजदूरी करने को आज विवश हैं | कई बार युवतियाँ कुंवारी जाति है और बिना विवाह किये ही बच्चो की माँ बन रही है उनका आर्थिक ,दैहिक शारीरिक शोषण होता रहा है , क्योंकि स्थानीय रोजगार सृजन में आज तक की सभी सरकारे विफल रही है । बेरोजगारी दर आज 18% है – जो राष्ट्रीय औसत (9.2%) से दोगुनी है । ग्रामीण अर्थव्यवस्था कृषि पर टिकी, लेकिन सिंचाई की कमी (केवल 12% भूमि सिंचित) ने किसानों कोमजबूर किया । भ्रष्टाचार ने राजस्व लूटा: कोयला माफिया से लेकर अवैध खनन तक, करोड़ों का काला धन बाहरी जेबें भर रही है और आदिवासी मूलवासी समाज इस लुट को टुकुर टुकर देखने को मजबूर है ,अवैध रूप से कोयला माफियाओ के इशारे पर बंद पड़े कोयला खानों में खनन करने से हजार हजार आदिवासी मूलवासी समाज कोयला खान में दब कर अकाल मौत मरने पर मजबूर है । नौकरशाही की जकड़न: IAS-IPS की लालफीताशाही ने योजनाओं को कागजों तक सीमित रखा और व्यापक रूप से योजनाओ में लुट मचाया जिस कारण कई आईएस लोग जेल भी गये और भारतीय प्रशासनिक सेवा को कलंकित किया । राजनेताओ ? की विलासिता – लग्जरी कारें, वेतन भत्ता , आवास एवं विदेशी यात्राओ ने – आम जनता की आंसुओं को कभी पोछ नही सका । एक रिपोर्ट के मुताबिक, 20 वर्षों में खनिज राजस्व का 70% कल्याण तक नहीं पहुंचा। खनन और वनों की अंधाधुंध कटाई से जल स्रोत सूख रहे हैं।बीते एक दशक में झारखंड के 40% इलाकों में भूजल स्तर 2–3 मीटर नीचे गया है।कई क्षेत्रों (विशेषकर लातेहार, गुमला, दुमका) में सूखे और अनियमित मानसून ने खेती चौपट कर दी है।यह भविष्य में “झारखंड की जल त्रासदी” का संकेत है।अपेक्षा थी कि 25 वर्षों में पलायन रुक जाएगा , विस्थापन समाप्त हो जायेगा , लेकिन वास्तविकता उलटी है। आदिवासी और मूलवासी समाज , जो झारखंड की रीढ़ हैं , आज भी संघर्ष की आग में तप रहे हैं और जीवन जीने के लिए संघर्षरत है । आज लिंग अनुपात 948 (राष्ट्रीय 943), लेकिन हिंसा और कुपोषण की दर ऊंची। 2024-25 बजट में महिलाओं के लिए 8021 करोड़ आवंटित, लेकिन ग्रामीण महिलाओं तक पहुंच सीमित रही । युवा, राज्य की 35% आबादी, बेरोजगारी के जाल में फंसे। कौशल विकास मिशन के 585 करोड़ से 84,216 युवाओं को प्रशिक्षित किया गया, लेकिन नौकरियां कहां ? अपेक्षा थी कि युवा उद्यमी बनेंगे , लेकिन पलायन ने सपनों को कुचल दिया। अनछुआ पहलू: मानकी मुंडा छात्रवृत्ति जैसी योजनाएं महिलाओं को तकनीकी शिक्षा दे रही, लेकिन ग्रामीण स्तर पर जागरूकता की कमी।दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यक: हाशिए का संघर्ष झारखंड की 26% आदिवासी, 12% दलित, 14% अल्पसंख्यक आबादी सबसे अधिक पीड़ित है । गरीबी दर ST/SC में 37%, मुस्लिमों में 32% है । भूमि अलगाव: FRA 2006 (फॉरेस्ट राइट्स एक्ट) के तहत 75 वर्ष पुराने दावों की मांग ने दलितों को बाहर कर दिया। आदिवासी मूलवासियों की जमीन हड़पने से उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर किया। आज अल्पसंख्यक (पसमांदा मुस्लिम) योजनाओं से वंचित हो रहे है । पिछड़े वर्गों में भेदभाव जारी। अपेक्षा थी कि PESA (पंचायत एक्सटेंशन टू शेड्यूल्ड एरिया) से स्थानीय शासन मजबूत होगा , लेकिन 25 वर्षो के बाद भी लागु नही किया जा सका | विकास का द्वंद्व: कितना हुआ, कितना होना चाहिए?25 वर्षों में प्रगति हुई: सड़कें (राष्ट्रीय राजमार्ग 20% बढ़े), बिजली पहुंच 95%, शिक्षा में साक्षरता 66.41% (2011 से 10% वृद्धि)। स्वास्थ्य में 6.2% बजट (2024-25), शिक्षा में 13.1%। ग्रामीण विकास में 13.6% आवंटन – बिरसा सिंचाई मिशन से 1 लाख कुएं। लेकिन अपेक्षा से कम : बेरोजगारी घटनी चाहिए थी 5% से नीचे, लेकिन 18% आज है जो चिंता का विषय है । स्वास्थ्य में IMR (शिशु मृत्यु दर) 27/1000 (राष्ट्रीय 28), लेकिन कुपोषण 19.6% बच्चों में आज भी है । शिक्षा में 58.7% युवा अशिक्षित है । ग्रामीण विकास: PMAY से 5.22 लाख घर बने, लेकिन आधारभूत संरचना (पानी, सड़क) में कमी। अनछुए पहलू: पर्यावरण – खनन से प्रदूषण, जल संकट; बच्चों का पोषण – आंगनबाड़ी अभियान से सुधार, लेकिन 190 करोड़ अपर्याप्त है । क्षेत्र अपेक्षित विकास (25 वर्षों में) वास्तविक स्थिति (2024-25) कमी का कारण रोजगार , रोजगारी 5%, स्थानीय उद्योगों से 50 लाख नौकरियां 18% बेरोजगारी, पलायन 20 लाख+खनन-केंद्रित नीति, कौशल कमी शिक्षा साक्षरता 90%, जीरो ड्रॉपआउट 66.41%, 21% युवा स्कूल से बाहर बुनियादी ढांचा कमजोर स्वास्थ्य IMR 15, कुपोषण 10% IMR 27, कुपोषण 19.6% बजट 6.2%, पहुंच सीमित ग्रामीण विकास100% सिंचाई, सभी गांव कनेक्टेड 12% सिंचाई, 40% गांव असुविधाजनक भ्रष्टाचार, नियोजन विफल महिला सशक्तिकरण लिंग समानता, हिंसा में 50% कमी 8021 करोड़ बजट, लेकिन ग्रामीण महिलाएं वंचित जागरूकता अभाव राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार,हर साल झारखंड से 3000 से अधिक नाबालिग लड़कियां अन्य राज्यों में तस्करी का शिकार होती हैं।यह विकास की कहानी के पीछे छिपा एक मौन अपराअनछुए पहलू: आधारभूत संरचना और समावेशी विकास बच्चों की शिक्षा-स्वास्थ्य अनदेखा: 14-18 वर्ष के 58.7% युवा पढ़ना-लिखना नहीं जानते है जो सरकार के लिए शर्म का विषय है । ग्रामीण विकास में सखी मंडल से 84,216 युवाओं को कौशल, लेकिन सड़क-बिजली-पानी की कमी। आधारभूत संरचना: 5255 करोड़ निवेश से डैम सौंदर्यीकरण, लेकिन ग्रामीण सड़कें अपर्याप्त। अनछुआ: पर्यटन – झारखंड की प्राकृतिक सुंदरता को बढ़ावा, लेकिन खनन ने जंगलों को नष्ट किया।समावेशी भविष्य की ओर: सुझाव और आह्वान रजत जयंती पर झारखंड को आत्मचिंतन का अवसर है। सुझाव: स्थानीय नियोजन: FRA/CNT को सख्ती से लागू, आदिवासी मूलवासी भागीदारी अनिवार्य।रोजगार-केंद्रित विकास: खनन राजस्व से स्थानीय उद्योग, कौशल केंद्र। महिला-युवा फोकस: छात्रवृत्ति व योजनाओं का विस्तार, पलायन रोकने हेतु ग्रामीण उद्यम। भ्रष्टाचार मुक्ति: ई-गवर्नेंस मजबूत, नौकरशाही सुधार। समावेशी नीति: दलित-आदिवासी-अल्पसंख्यक बोर्ड, भाषा-संस्कृति संरक्षण। हेमंत सोरेन सरकार का विजन – अगले 25 वर्षों की योजना – सकारात्मक है, लेकिन क्रियान्वयन जरूरी। झारखंड रजत जयंती न मनाएं, बल्कि प्रतिज्ञा लें: यह राज्य अमीर रहेगा, लेकिन अपनी जनता को गरीब नहीं होने देंगे। बिरसा की पुकार गूंजेगी – ‘अबुआ राज हिंदू राज नहि’ – जब तक न्याय न मिले। जय झारखंड!झारखंड ने 25 वर्ष पूरे किए हैं,लेकिन इसके असली जश्न की शुरुआत तभी होगी,जब यहां का हर नागरिक यह कह सके —“हमने अपने सपनों का झारखंड देखा।”बिरसा मुंडा का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है —“ अबुआ दिशुम अबुआ राज,”(हमारी धरती और हमारा शासन, किसी और का नहीं)।अब वक्त है, झारखंड को फिर से झारखंडियों का बनाने का।

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