पाकुड़ : प्रीतम सिंह यादव की रिपोर्ट। जिले में विकास योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन जब तैयार सरकारी भवन ही उपयोग में नहीं आएं, तो योजना के क्रियान्वयन और प्रशासनिक निगरानी पर सवाल उठना स्वाभाविक है। पाकुड़ सदर प्रखंड में ग्रामीण कार्य विभाग के तहत लगभग 573.71 लाख रुपये (5.73 करोड़ रुपये) की लागत से निर्मित प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ), अंचलाधिकारी (सीओ) और तृतीय एवं चतुर्थ वर्गीय कर्मचारियों के आवास सहित परिसर विकास एवं अन्य कार्यों से जुड़ा भवन इसका उदाहरण बनता नजर आ रहा है।बताया जाता है कि भवन का निर्माण कार्य पूरा होने के बाद पिछले वर्ष 8 नवंबर को पाकुड़ विधायक निसात आलम और राजमहल लोकसभा क्षेत्र के सांसद विजय कुमार हांसदा ने इसका उद्घाटन किया था। इसके बावजूद, स्थानीय स्तर पर उठ रहे सवालों के अनुसार, अब तक भवन को संबंधित विभाग को विधिवत हस्तांतरित नहीं किया गया है। नतीजतन, इतना बड़ा सरकारी भवन तैयार होने के बावजूद इसका अपेक्षित उपयोग शुरू नहीं हो पाया है।

उद्घाटन हुआ, लेकिन उपयोग शुरू होने का इंतजार
सरकारी भवनों का निर्माण आमतौर पर प्रशासनिक कामकाज को बेहतर बनाने, अधिकारियों-कर्मचारियों को आवासीय सुविधा उपलब्ध कराने और सरकारी संसाधनों का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करने के उद्देश्य से किया जाता है। लेकिन यदि निर्माण पूरा होने और उद्घाटन के बाद भी भवन विभाग को नहीं सौंपा जाता, तो योजना के वास्तविक उद्देश्य पर सवाल खड़े होते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब भवन का निर्माण पूरा हो चुका है, तो इसके हस्तांतरण और उपयोग की प्रक्रिया में देरी क्यों हो रही है? संबंधित विभाग और जिला प्रशासन को इस दिशा में अब तक ठोस पहल क्यों नहीं करनी चाहिए थी?

रखरखाव नहीं हुआ तो सरकारी संपत्ति को होगा नुकसान
लोगों को आशंका है कि लंबे समय तक उपयोग से दूर रहने और नियमित रखरखाव नहीं होने पर भवन की स्थिति धीरे-धीरे खराब हो सकती है। ऐसे में जिस सरकारी संपत्ति के निर्माण पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं, उसकी सुरक्षा और देखभाल भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन जाता है। स्थानीय लोगों का सवाल है कि यदि समय पर भवन का उपयोग शुरू नहीं होना था, तो निर्माण के बाद हस्तांतरण और संचालन की व्यवस्था पहले से क्यों नहीं की गई? भविष्य में भवन की मरम्मत की जरूरत पड़ी, तो क्या सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा?
जिम्मेदारी किसकी, जवाब कौन देगा?
इस मामले में सबसे अहम सवाल यह है कि भवन का निर्माण पूरा होने के बाद भी हस्तांतरण और उपयोग की प्रक्रिया लंबित रहने के पीछे वास्तविक कारण क्या है। क्या तकनीकी या प्रशासनिक औपचारिकताएं बाकी हैं, या विभागों के बीच समन्वय की कमी के कारण मामला अटका हुआ है? इसकी आधिकारिक स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है। जिला प्रशासन और संबंधित विभाग को भवन की वर्तमान स्थिति, हस्तांतरण में देरी के कारणों और इसे उपयोग में लाने की समय-सीमा सार्वजनिक करनी चाहिए। साथ ही, भवन का निरीक्षण कर यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि निर्माण पर खर्च की गई राशि से बनी सरकारी संपत्ति सुरक्षित रहे और उसका उपयोग जल्द शुरू हो। जनता के पैसे से बनी इमारत केवल उद्घाटन की पट्टिका तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। अब देखना होगा कि जिला प्रशासन और संबंधित विभाग इस मामले में कब पहल करते हैं और लगभग 5.73 करोड़ रुपये की लागत से तैयार इस भवन का वास्तविक उपयोग कब शुरू हो पाता है।

