पाकुड़ अपडेट : राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत दादा हमारे भगवान को बेच दिया पता नहीं ऐसा कौन सा मजबूरी आ गया था, आरोप लगाते हुए उक्त बाते सोमवार को डीसी कार्यालय पहुंचे रूबीलाल किस्कू जो जिला सेंगेल छात्र मोर्चा के अध्यक्ष है। दरअसल ये लोग दर्जनों की संख्या में अपनी मांगो को लेकर डीसी साहब के माध्यम से महामहिम राष्ट्रपति को पत्र देने मुख्यालय पहुंचे थे। वही लोबिन मरांडी जिला अध्यक्ष पाकुड़ ने बताया कि हम भारत के लगभग 15 करोड़ आदिवासियों को संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत जाति की मान्यता अर्थात आदिवासी या अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त है। परंतु दुर्भाग्य से अबतक अनुच्छेद 25 के तहत धर्म की मान्यता “सरना धर्म”कोड हासिल नही हो सका है। जबकि यह एक मौलिक अधिकार है। वर्ष 2021-2027 जनगणना का वर्ष है।हम आदिवासी कब-तक अपने मौलिक अधिकारों से वंचित रखे जाएंगे और ठगे जाएंगे? संविधान के अनुच्छेद 25 में उल्लेखित है कि अंत: करण और धर्म के आबाद रूप से माननें, आचरण और प्रचार की स्वतंत्रता है।

अतएव आदिवासियों को संवैधानिक (धार्मिक) मौलिक अधिकार से वंचित करना उनके साथ घोर अन्याय और पक्षपात पूर्ण रवैया साबित होता है। हम भारत के अधिकांश आदिवासी प्रकृति पूजक हैं। प्रकृति पूजा में विश्वास करते हैं।इस पूजा पद्धति एवं संस्कृति को सरना धर्म के नाम से स्वीकार एवं प्रचलित किया गया है। प्रकृति पूजा में आदिवासी सूरज, चंद,धरती,पर्वत, नदी, पेड़ – पौधे,जीव – जंतु आदि की आराधना एवं पूजा करते हैं। चूंकि उनसे जीवन शक्ति प्राप्त होती है।इस प्रकार आदिवासी जीवन पद्धति प्रकृति और पर्यावरण के संतुलन का एक अनोखा एवं स्वास्थ्य प्रणाली भी है। अतः इस विशिष्ट पूजा पद्धति और संस्कृति पर आधारित आदिवासियों के धर्म को अवश्य मान्यता मिलनी चाहिए। हम भारत के अधिकांश आदिवासी चूंकि प्रकृति पूजा पद्धति संस्कृति से जुड़े हुए हैं। अतः हम न हिन्दू हैं,न ही ईसाई आदि। हमारे बीच वर्ण व्यवस्था,दहेज प्रथा, ऊंच – नीच आदि का व्यवहार नहीं है।हम प्रकृति को ही अपना पालनहार और ईश्वर के रूप में पूजते हैं।अतएव हमारी धार्मिक सोच, संस्कार, विश्वास अन्य धार्मो से भिन्न है।

दूसरे धर्मों के साथ जुड़ना हमारे स्वभाव और संस्कृति के खिलाफ है। जब 6 प्रमुख धार्मो और उनमें शामिल जैन और बौद्ध धर्म को मानने वालों की जनसंख्या सरना धर्म मानने वालों से बहुत कम है, को भी मान्यता मिल सकती है। तो आदिवासियों के सरना धर्म मानने वालों के साथ यह पक्षपात पूर्ण रवैया क्यों? क्या भारत सरकार और झारखण्ड सरकार सरना धर्म मानने वाले लगभग 15 करोड़ आदिवासियों को जबरन हिन्दू, मुसलमान, ईसाई आदि बनाने को मजबूर करना चाहती है?यह संयुक्त राष्ट्र के विश्व आदिवासी अधिकार घोषणा पत्र और मानवीय अधिकारों का भी उल्लंघन जैसा है। यद्धपि प्रकृति पूजक भारतीय आदिवासी भिन्न – भिन्न नामों से विभिन्न प्रदेशों में अपनी धार्मिक आस्था को नाम देकर अभिव्यक्त करते हैं।मगर सभी प्रकृति पूजक हैं, मूर्ति पूजक नहीं। भारत के अधिकांश प्रदेशों में अधिकांश आदिवासी सरना धर्म के नाम पर इसे अभिव्यक्त करते हैं।अतएव सरना धर्म को फिलहाल आदिवासियों के प्रकृति पूजक धर्म के सभी प्रदेशों में वास करने वाले सभी आदिवासी समूहों के लिए – कोमन – नाम के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। सरना धर्म को अविलंब मान्यता से इनकार करना जहां हमारी धार्मिक आजादी पर हमला है वहीं हमें अन्य धर्मों के शोषण उत्पीड़न के लिए मजबूर करना है।यह हमारे अस्तित्व, पहचान, हिस्सेदारी, गरिमा और धार्मिक आजादी के लिए अनिवार्य है। भारत के आदिवासियों की तरफ से आदिवासी सेंगेल अभियान के राष्ट्रीय अध्यक्ष पूर्व संसाद सालखन मुर्मू के द्वारा सरना धर्म की मान्यता और जनगणना में सरना धर्म कोलम – कोड को प्राप्त करने हेतु अनेक पत्राचार भारत के मान्य राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केन्द्रीय गृह मंत्री, झारखंड के राज्यपाल और मुख्यमंत्री आदि से अनेक बार किया है। भारत के राष्ट्रपति कार्यालय, पीएमओ और केन्द्रीय गृह मंत्री मंत्रालय से उचित कार्रवाई की अनुशंसा भी हुई है। किन्तु अब तक सभी बेकार साबित हुए हैं।8.साथ ही प्राकृति पूजक आदिवासियो(सरना धर्मावलंबियों)के सबसे बड़ा धार्मिक आस्था का केंद्र, झारखंड के गिरिडीह जिले में स्थित आदिवासियों का मरांग बुरु (पारसनाथ पहाड़)जो झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार ने 5 जनवरी 2023 को लिखित रूप से जैनों को सौंपा है।उसे अविलंब आदिवासियों को वापस किया जाए।तथा झारखंड के बोकारो जिले में स्थित लुगुबुरू, पश्चिम बंगाल के पुरूलिया में स्थित अयोधिया बुरु आदि, आदिवासियों के धार्मिक स्थलों को हिन्दू एवं अन्य धर्मों के अतिक्रमण से अविलंब मुक्त किया जाए।मुख्य रूप से मदन मुर्मू संताल परगना प्रमंडल महासचिव , रूबीलाल किस्कू जिला सेंगेल छात्र मोर्चा अध्यक्ष, कमल सोरेन , मनोज मरांडी , सुलेमान किस्कू , अमिन टुडू, दिनेश सोरेन, फिलीप सोरेन , रंजीत टुडू माकू टुडू आदि मौजूद थे।
